Saturday, November 22, 2014

नेतरहाट की हीरक यादें:
दस वर्ष पूर्व, स्वर्ण जयंती की समाप्ति के पश्चात, श्रीमन कांति जी ने हीरक वर्ष को भी मनाने की  मंशा ज़ाहिर की।   मन में हुआ, अवश्य। जब यह अवसर आएगा, बड़े उत्साह के साथ मनेगा।  हुआ भी यही। जो न हो सका,  एक अनुभव रहा - आगे बढ़ने हेतु प्रोत्साहन।  जो देखा समझा - सोच से  परे। सुखद एवं आश्चर्यजनक। 

देखा यह कि बच्चे हमारे अग्रणी हैं।  उनसे सीखना एक आनंद। मासूमियत, मेधा, उत्साह, उमंग,उत्सुकता, शिष्टाचार, समर्पण, स्फूर्ति, कला-पूर्ण, नेता, वक्ता, गायक, वादक, खिलाड़ी, क्या कहें - जो भी सोचा जाए कम होगा। 

ईमानदारी से कहें तो लगा जैसे, संगीत में श्रीमान सक्सेना जी, कला में श्रीमान परितोष  सेन जी,  संस्कृत में श्रीमान त्रिपाठी जी, हिंदी में श्रीमान कांति जी - सब के सब की कृतियाँ पीछे छूट चुकें  हों। नव-नियुक्त संस्कृत-शिक्षक श्रीमान ओम प्रकाश आर्य जी एवं हिंदी शिक्षक श्रीमान मयंक भार्गव जी ने मन  जीत लिया। प्राचार्य श्रीमान बिमलांशु शेखर मलिक ने तो लगा जैसे वाणी को पी ही लिया हो - क्या हिंदी, क्या अंग्रेजी, क्या उर्दू ! एक प्रखर व्यक्तित्व। सुना कि  भौतिकी-शिक्षक श्री अभिषेक मिश्रा अद्वितीय हैं।  आश्वासन मिला - २० १७ की आई आई टी में कम से कम दस तो बाज़ी मार  ही लेंगे। जिनका नाम न लिया वे भी ऐसे ही होंगे अथवा सिद्ध होंगे। यह है मूल्यों के मूल्य - पूर्व और वर्तमान शिक्षक-वृन्द की धरोहर। एक से बढ़ कर एक।  हमारा विष्वास है कि नए-पुराने सब को साथ लेकर यदि professionalize किया जाए तो उत्कृष्टता का नेतरहाट रूपी प्रयोग सचमुच विद्यालय से विश्व-विद्यालय की दिशा में मैराथन दौड़ लेगा।